संगठन की असली ताकत होती है सदस्य की संख्या — रवीन्द्र त्रिपाठी
नए व्यापारियों तथा उद्यमियों को संगठन से जोड़ने का चलाया जाए अभियान —रवीन्द्र त्रिपाठी
भारतीय उद्योग व्यापार मंडल का सदस्यता अभियान आज नगर सुल्तानपुर में नए व्यापारी उद्यमियों को सदस्य बनाने का अभियान महिला अध्यक्ष श्री मती पूनम अग्रहरि की अध्यक्षता तथा प्रदेश महामंत्री रवीन्द्र त्रिपाठी के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुआ। अभियान के दौरान दर्जनों व्यापारियों को प्रदेश महामंत्री द्वारा सदस्यता प्रमाणपत्र वितरित किए गए।
सदस्यता अभियान की शुरुआत करते हुए श्री त्रिपाठी ने कहा कि जिस प्रकार से घर में नए सदस्य के पैदा होने पर खुशी होती है इस प्रकार जब नए उद्योग व्यापार स्थापित होते हैं तो हम लोगों को भी उतनी प्रसन्नता होती है और आज अभियान चला कर नए व्यापारी तथा उद्यमियों को भारतीय उद्योग व्यापार मंडल से जोड़ा गया। श्री त्रिपाठी ने आगे कहा कि किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके सदस्यों की संख्या में निहित होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिक सदस्यबल वाले संगठन की आवाज़ सर्वाधिक प्रभावशील होती है। उन्होंने जिले में अधिक से अधिक व्यापारी सदस्यों को जोड़ने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि व्यापारियों की सुरक्षा, सम्मान और हितों की रक्षा के लिए संगठनात्मक एकजुटता अत्यंत आवश्यक है। प्रदेश में बेहतर कानून व्यवस्था, सुचारू विद्युत आपूर्ति और उद्योगों के लिए अनुकूल माहौल के कारण नए निवेश हो रहे हैं, जिसके लिए मुख्यमंत्री जी की प्रशंसा की गई।
श्री त्रिपाठी ने यह भी कहा कि भारत सरकार द्वारा जीएसटी सुधार और कटौती जैसे निर्णयों ने व्यापार जगत को नई ऊर्जा दी है। उन्होंने व्यापारी नेताओं से व्यापारियों की समस्याओं को पहचानने और उनके समाधान के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया। साथ ही उन्होंने चेताया कि जहां भी अधिकारी व्यापारी हितों के विरुद्ध कार्य करेंगे, वहां लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराया जाएगा। सदस्यता अभियान के दौरान दर्जनों नए उद्यमियों व्यापारियों को सदस्यता प्रमाण पत्र प्रदेश महामंत्री द्वारा प्रदान किया गया। इस अवसर पर जिला उपाध्यक्ष राजेंद्र कसौधन जिला उपाध्यक्ष प्रदीप अग्रहरि, महिला नगर अध्यक्ष पूनम अग्रहरि संदीप अग्रहरि रमेश वर्मा आदि शमिल रहे।
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*☘️विश्व वन्यजीव दिवस-सनातन संस्कृति के आलोक में प्रकृति और प्राणी मात्र की रक्षा का संकल्प* *✨सनातन जीवनदृष्टि में पर्यावरण की समस्त समस्याओं का समाधान निहित* ऋषिकेश, 3 मार्च। आज सम्पूर्ण विश्व में विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन पशु-पक्षियों और वन्य प्राणियों की विविधता का उत्सव है, जो हमें स्मरण कराता है कि पृथ्वी पर जीवन का संतुलन इन्हीं जीवों से संचालित होता है। यूनाइटेड नेशन द्वारा स्थापित यह दिवस मानवता को वन्यजीव संरक्षण, प्राकृतिक आवासों की रक्षा तथा सतत जीवनशैली अपनाने का संदेश देता है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारतीय दृष्टि से देखें तो वन्यजीव संरक्षण हमारी सनातन परंपरा की आत्मा है। सनातन धर्म में समस्त सृष्टि ईश्वर का ही विस्तार है “ईशावास्यमिदं सर्वम्।” जब हम किसी जीव की रक्षा करते हैं, तो वस्तुतः हम उसी परम चेतना की सेवा करते हैं। यही कारण है कि हमारी संस्कृति में ऐसे असंख्य जीव हैं जिन्हें दैवीय स्वरूप प्रदान किया गया। यह केवल आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। भारत के प्राचीन आश्रम, गुरुकुल और वनवासी जीवन प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के आदर्श उदाहरण रहे हैं। ऋषि-मुनियों ने वनों को तपोभूमि बनाया, नदियों को माता कहा और पशु-पक्षियों को परिवार का अंग माना। आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि और पारिस्थितिक असंतुलन से जूझ रहा है, तब हमारी यही सनातन जीवनदृष्टि समाधान प्रस्तुत करती है। दुर्भाग्यवश, शिकार, अवैध व्यापार, वनों की कटाई, प्रदूषण और अंधाधुंध विकास ने अनेक प्रजातियों को विलुप्ति के कगार पर पहुँचा दिया है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक संकट भी है। जब मनुष्य स्वार्थवश प्रकृति का दोहन करता है, तब वह अपनी जड़ों से कट जाता है। हमें विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। हमारा संकल्प यह होना चाहिये कि हम सतत जीवनशैली अपनाएँ, प्लास्टिक का न्यूनतम उपयोग करें, जल और ऊर्जा की बचत करें, वृक्षारोपण करें, जैविक खेती को बढ़ावा दें और स्थानीय जैव विविधता की रक्षा करें। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए ताकि युवा पीढ़ी प्रकृति के प्रति संवेदनशील बने। भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है “वसुधैव कुटुम्बकम्।” जब पूरी धरती हमारा परिवार है, तो वन्यजीव भी हमारे ही परिवार के सदस्य हैं। परिवार की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। हमें यह समझना होगा कि जंगलों को बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। आज विश्व वन्यजीव दिवस पर आइए हम यह प्रतिज्ञा लें कि हम प्रकृति के साथ युद्ध नहीं, सहयोग का मार्ग चुनेंगे। हम अपने बच्चों को ऐसी जीवनशैली देंगे जो धरती का सम्मान करे। हम अपने पर्व-त्योहारों, संस्कारों और दैनिक व्यवहार में पर्यावरण संरक्षण को स्थान देंगे। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है, यही सनातन संस्कृति की पहचान है। वन्यजीवों की रक्षा केवल जैव विविधता की रक्षा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और भविष्य की सुरक्षा है। जब जंगल जीवंत होंगे, नदियाँ निर्मल होंगी और वन्यजीव सुरक्षित होंगे, तभी भारत समृद्ध बनेगा। आइए, इस पावन दिवस पर हम सब मिलकर प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें और संकल्प लें प्रकृति की रक्षा ही मानवता की रक्षा है, वन्यजीवों की सुरक्षा ही भविष्य की सुरक्षा है।
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